कलम भूली, अलफ़ाज़ भूली
कलम भूली, अलफ़ाज़ भूली
भूली उन  गलियों में  जाना
जहाँ बनायीं यादें अनगिनत
जहाँ गुज़ारा था एक ज़माना
कलम भूली, अलफ़ाज़ भूली …..
जाने क्यों दिल झुकता ही  नहीं
उस और जाकर भी वहां रुकता ही नहीं
क्या चल रही सोच, कहाँ है मशगूल
किसी बात का उतर मिलता ही नहीं
हसते रोते, जागते सोते
किसी वक़्त था इनसे
रूहों का याराना
कलम भूली, अलफ़ाज़ भूली …..
आज उठी कलम पर समझ न आया
किसको चाह रही थी लिखना
किसका ढूंढ रही सरमाया
उलझी थी खुद और सुलझा रही लफ़ज़ोन को
शब्दों से शायद पकड़ना चाह रही थी नब्ज़ों को
दुआ यही किसी तरह भी चाहे,बस चलता रहे
इनका और मेरा याराना
कलम भूली, अलफ़ाज़ भूली …..
    By Tanu Shaunak 

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